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  • Krishna Janmashtami

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की आसान पूजन विधि और शुभ मुहूर्त


    देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां जोरो पर हैं। सभी भक्त अपनी सामर्थानुसार सोमवार 5 सितम्बर को भगवान के जन्मोत्सव को मनाने के लिए वस्त्र, फल, मेवे, प्रसाद की खरीदारी कर रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि में रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इस दिन जो भी सच्चे मन से व्रत रखता है वह मोह-माया के बंधन से मुक्त हो जाता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन सच्चे मन से व्रत करते हुए की गई कोई भी मनोकामना पूरी होती है

    पूजन विधि

    जन्माष्टमी के दिन प्रात: जल्दी उठें और नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लें। इसके बाद माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल अथवा मिट्टी की (यथाशक्ति) मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करें। भगवान श्रीकृष्ण को नए वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा, देवकी और लक्ष्मी आदि देवताओं के नाम जपें। भगवान श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें।

    रात्रि में 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। लड्डू गोपाल को झूला झुलाएं। पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाएं। इसके अलावा यथाशक्ति अन्य प्रसाद और फल आदि का भोग लगाएं। श्रीकृष्ण की आरती करें और रात्रि में शेष समय भजन, स्तोत्र, भगवतगीता का पाठ करें। अगली सुबह स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें।

    भगवान श्रीकृष्ण की आरती


    "आरती कुंजविहारी की। श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की।।
    गले में बैजंतीमाला, बजावै मुरली मधुर वाला। |
    श्रवन में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। श्री गिरधर ..
    गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली,
    लतन में ठाढ़े बनमाली।
    भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सो झलक,
    ललित छवि स्यामा प्यारी की। श्री गिरधर ..
    कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसे,
    गगन सो सुमन राशि बरसै,
    बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालनी संग,
    अतुल रति गोपकुमारी की। श्री गिरधर ..
    जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा,
    स्मरन ते होत मोह-भंगा,
    बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अध कीच,
    चरन छवि श्रीबनवारी की। श्री गिरधर ..
    चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू,
    चहूं दिसि गोपी ग्वाल धेनू,
    हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव-फंद,
    टेर सुनु दीन भिखारी की। श्री गिरधर ..
    आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरधर कृष्णमुरारी की।। " ||




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