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  • About Ganesh Chaturthi

    Ganesh Chaturthi is celebrated as birth anniversary of Lord Ganesh. On Ganesh Chaturthi, Lord Ganesh is worshipped as the god of wisdom, prosperity and good fortune. It is believed that Lord Ganesh was born during Shukla Paksha of Bhadrapada month. Currently Ganesh Chaturthi day falls in month of August or September in English calendar.
    The Ganeshotsav, the festivity of Ganesh Chaturthi, ends after 10 days on Anant Chaturdashi which is also known as Ganesh Visarjan day. On Anant Chaturdashi, devotees immerse idol of Lord Ganesh in water body after a gala street procession.

    Ganesh Chaturthi is also known as Vinayaka Chaturthi and Ganesh Chauth.

    Ganesha Chaturthi Puja Vidhi


    सर्वप्रथम एक शुद्ध मिटटी या किसी धातु से बनी श्री गणेश जी की मूर्ति घर में लाकर स्थापित करें व मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से उनका पूजन करना चाहिए तथा दक्षिणा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से पांच लडडू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राम्हणों में बांट देना चाहिए। गणेश जी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए जो उत्तम है।
    Lord Ganesha is worshipped with all sixteen rituals along with chanting of Puranik Mantras during Ganesha Chaturthi Puja which is also known as Vinayaka Chaturthi Puja. Worshipping Gods and Goddesses with all 16 rituals is known as Shodashopachara Puja (षोडशोपचार पूजा).

    Although Ganesha Puja can be done during Pratahkala, Madhyahnakala and Sayankala but Madhyahnakala is preferred during Ganesha Chaturthi Puja. Madhyahnakala Puja time for Ganesha Puja can be known at Ganesha Chaturthi Puja Muhurat.

    If you have Lord Ganesha installed at your home and is worshipped daily then Avahana (आवाहन) and Pratishthapan (प्रतिष्ठापन) should be skipped as these two rituals are done for newly bought statues of Lord Ganesha either made of clay or made of metal. It should be noted that pre-installed statue of Lord Ganesha at home are not given Visarjan (विसर्जन) but given Utthapana (उत्थापन) at the end of Puja.


    षोडशोपचार पूजन विधि के लिए यहाँ क्लिक करें

    Shree Ganesh Katha | श्रीगणेश पौराणिक कथा

    भगवान गणेश के संबंध में यूँ तो कई कथाएँ प्रचलित है किंतु उनके गजानन गणेश कहलाने और सर्वप्रथम पूज्य होने के संबंध में जग प्रसिद्ध कथा यहाँ प्रस्तुत है।

    एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नान स्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर 'बाल गणेश' को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया।

    इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं। गणेशजी उन्हें रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है। युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं।

    शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला। माता का रौद्र रूप देख शिव एक हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़कर गणेश जी को पुन: जीवित कर देते हैं। तभी से भगवान गणेश को गजानन गणेश कहा जाने लगा।

    श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesha Chalisa in Hindi)

    जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
    वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
    राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
    पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥1॥

    सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥
    धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्वविख्याता ॥
    ऋद्घिसिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ॥
    कहौ जन्म शुभकथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ॥2॥

    एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥
    भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ॥
    अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥
    अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥3॥

    मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ॥
    गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ॥
    अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक स्वरुप है ॥
    बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥4॥
    सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥
    शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥
    लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥
    निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ॥5॥

    गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ॥
    कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥
    नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहाऊ ॥
    पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥6॥

    गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ॥
    हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ॥
    तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ॥
    बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥7॥

    नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे ॥
    बुद्घ परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥
    चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई ॥
    चरण मातुपितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥8॥

    तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई । शेष सहसमुख सके न गाई ॥
    मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥
    भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ॥
    अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ॥9॥

    श्री गणेशजी की आरती

    जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
    माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ x2

    एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी
    माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी। x2

    (माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी)
    पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा
    (हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा)
    लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥ x2

    जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
    माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
    अँधे को आँख देत कोढ़िन को काया
    बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया। x2

    'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
    माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ x2

    (दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी )
    (कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥)

    जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
    माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

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