ऋषि पंचमी की व्रत कथा एवम पूजा विधि

॥ जय श्री सांवलिया सेठ ॥ बोल कर अधिक से अधिक इस पोस्ट को शेयर एवम लाइक करें, सेठ जी आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे |

Bhadrapada Shukla Panchami is known as Rishi Panchami and usually observed two days after Hartalika Teej and one day after Ganesh Chaturthi.

Rishi Panchami Vrat

Rishi Panchami Vrat

विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।

एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?

उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।

धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

ALSO READ  कज़री तीज कथा एवं पूजन विधि

पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी सभी वर्ग क‍ी स्त्रियों को करना चाहिए। इस दिन स्नानादि कर अपने घर के स्वच्छ स्थान पर हल्दी, कुंकुम, रोली आदि से चौकोर मंडल बनाकर उस पर सप्तऋषियों की स्थापना करें।

गन्ध, पुष्प, धूप, दीप नैवेद्यादि से पूजन कर-

कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं सर्व गृह्नन्त्वर्ध्यं नमो नमः’॥

से अर्घ्य दें। इसके पश्चात बिना बोया पृथ्वी में पैदा हुए शाकादिका आहार करके ब्रह्मचर्य का पालन करके व्रत करें।

इस प्रकार सात वर्ष करके आठवें वर्ष में सप्तर्षिकी पीतवर्ण सात मूर्ति युग्मक ब्राह्मण-भोजन कराके उनका विसर्जन करें।

कहीं-कहीं, किसी प्रांत में स्त्रियां पंचताडी तृण एवं भाई के दिए हुए चावल कौवे आदि को देकर फिर स्वयं भोजन करती है।

The idea behind observance of Vrata on this day is to express respect, gratitude and remembrance of the deeds of those ancient Rishis who devoted their life for the cause of society. If performed by women it is believed, that any ill deeds or sins  which they might have committed and the mistakes their past or present during the menstruation either voluntarily or involuntarily, could be washed out by doing this Vrata.
It is told to remember the Rishis like Kashyap, Atri, Bharadwaj, Vishwamitra, Gautam, Janadagni and Vashishtha.
Near the North Pole there are seven ‘Nakshatras’, which are popularly known as ‘Saptarshi’. They are called so, purposely to remember the names of the Rishis permanently

॥ जय श्री सांवलिया सेठ ॥ बोल कर अधिक से अधिक इस पोस्ट को शेयर एवम लाइक करें, सेठ जी आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *