दशामाता व्रत कथा 5

दशामाता व्रत कथा 4

एक राजा की दो रानिया थी | रानी की प्यारी रानी को लक्ष्मी कहा जाता था और दूसरी रानी को रानी होने पर भी कुलक्ष्मी कहा जाता था |

एक दिन लक्ष्मी रानी क्रोध होकर लकड़ी का पटा ले मलिन कपड़े पहनकर कोप भवन मैं जा लेटी | राजा ने लक्ष्मी से पूछा-‘तुम कोप भवन मैं क्यों पड़ी हो ? तुम क्या चाहती हो ?’ रानी बोली -‘ कुलक्ष्मी को देश निकाला दिया जाये |’ कुलक्ष्मी रानी थी इसलिए उसे निकाला देने से राजा की बदनामी होने का डर था | इसलिए रानी को पीहर छोड़ कर आने की बात सोची गई |

राजा ने पटरानी को एक रथ मैं सवार कराया और स्वयं घोड़े पर चढ़ कर रथ के साथ चलने लगा | एक बीहड़ जंगल मैं पहुच कर राजा ने रथ को रुकवाया | पालकी ढोने वालो को वहा से हट जाने को कहा गया | राजा रानी को उस जंगल मैं छोड़कर घोंड़े पर सवार होकर अपने महल मैं आ गया |

कुलक्ष्मी को बाट जोहते सारी रात बीत गई | रानी को प्यास लगी | वह रथ से उतर कर पानी के तलाश  मैं चल दी | रानी ने आस-पास पानी खोजा परंतु उसे कोई जलासय नहीं दिखाई दिया | रानी ने एक सारस के जोड़े को एक तरफ जाते देखा | रानी कुलक्ष्मी सारस के जोड़े के पीछे चल दी | चलते-चलते वह एक नदी के किनारे पहुच गयी | रानी ने सोच आदि से निर्वत होकर उसी नदी मैं स्नान किया और जल पीकर अपनी प्यास भुजाई|

उस समय कुछ अन्य स्त्रियां भी स्नान कर रही थी | स्नान करने के बाद उन स्त्रियों ने दशामाता का डोरा लिया | उनके पास एक डोरा बच गया | उन्होंने रानी से डोरा लेने का अनुरोध किया | रानी डोरा लेकर अपने रथ मैं आकर बैठ गई |

दशामाता ने रानी की परीक्षा लेने के लिए एक बुढ़िया का वेश धारण कर उसके रथ के पास आई | वह रानी से बोली की -‘ बेटी ! यहाँ बैठी क्या कर रही हो ?’ रानी ने बुढ़िया से कहा -‘ पहले तुम बताओ तुम कोन हो ?’ बुढ़िया ने उतर दिया -‘ मैं तुम्हारी मौसी हु |’ तब रानी उसके गले लगकर रोने लगी | उसने अपनी विपदा भरी सारी कहानी बुढ़िया को बता दी | अंत मैं रानी ने बुढ़िया से कहा -‘ अब मुझे केवल तुम्हारा ही सहारा है | मेरी रक्षा करो |’

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दशामाता की कृपा से उसी जगह माया का शहर बस गया | रानी के भाई भाभी आदि सारा मायका वहा प्रकट हो गया | रानी ने अपने पीहर के साथ मिलकर नो दिन दशामाता की कथा -कहानिया सुनाई | दसवे दिन डोरे की पूजा होनी थी | उस दिन सवेरे उठ कर दशामाता ने रानी से कहा -‘ नदी मैं स्नान कर आओ | वहा तुमको स्वर्ण कलश मिलेगा | तुम उसे ले लेना और जो डोली तुम्हे लेने आये उसमे बैठ जाना | किसी से ये मत पूछना की यह डोली किसकी है ?’

रानी ने नदी मैं स्नान किया | वह स्नान करके बाहर निकल आई तो उसे दो स्वर्ण के कलश नदी के किनारे रखे मिले | उन्ही के पास रेशमी वस्त्र रखे थे | उन वस्त्रो को रानी ने पहन लिया | वह चलने को तैयार हुई तो उसे डोली आती दिखाई दी | वह डोली मैं बैठ गई और अपने घर पहुच गई |

घर पहुच कर उसने माया के परिवार की सब महिलाये सहित दशामाता के डोरे की पूजा की | सुहागिनों को भोजन कराया | इसके बाद उसने पारण किया | अब रानी अपने पीहर मैं आनद पूर्वक सबके साथ मिलकर रहने लगी |

इधर कुछ समय बाद राजा को रानी कुलक्ष्मी का ध्यान आया | राजा ने विचार किया की जिस दिन से मैं रानी को जंगल मैं छोड़कर आया हु | तब से उनका कोई समाचार नहीं मिला | चलकर देखना चाहिए  की रानी कुलक्ष्मी का क्या हाल है ? मंत्रियो ने राजा को समझाया की अब रानी से मिलना आपके लिए ठीक नहीं होगा | परंतु राजा ने मंत्रियो की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया |

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वह घोड़े पर सवार होकर उसी स्थान पर पहुचा जहा पर रानी को छोड़ आया था | राजा को ये देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ की यहाँ तो सघन वन था परंतु अब यहाँ रमणीक बस्ती बसी हुई है | राजा ने लोगो से पूछा -‘ यह कोन-सी नगरी है ? ‘ लोगो ने उसे बताया की -‘ यह कुलक्ष्मी का नगर है |’ अब तो राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा | वह बार-बार सोच रहा था की क्या यह नगर मेरी पटरानी कुलक्ष्मी द्वारा बसाया नगर है ?

राजा ने कुलक्ष्मी के महल के पास जाकर सुचना भिजवाई की उनसे अमुक देश के राजा मिलना चाहते है | रानी ने राजा को पहचान कर मिलने से मना कर दिया परंतु मौसी ने उसे समझाया की -‘ हिन्दुओ मैं तो पति परमेस्वर माना जाता है | तुम्हे यही उचित है की तुम यथाशक्ति उनका आदर सत्कार करो |’

मौसी के कहने पर रानी कुलक्ष्मी ने राजा को महल मैं बुलवाया | दोपहर को राजा को भोजन पर बुलाया गया | राजा के साथ नाइ भी था | रानी राजा और नाइ को भोजन कराने लगी | पहली बार रानी ने नाइ की पतल पर भोजन परोसा तो नाइ ने रानी के पैर पर एक छिटा लगाया | रानी इस भेद को नहीं समझ सकी की नाइ ने उसके पेर पर रायते का छिटा क्यों मारा | रानी दूसरी बार पोशाक बदल कर फिर आई |

राजा मन मैं सोचने लगा की यहाँ तो बहुत सी रानिया है | सबकी सकल एक जैसी है | मैं अपनी रानी को कैसे पहचानुगा ? डेरे आकर राजा ने नाइ से कहा -‘ यहाँ तो कई रानिया है | मैं अपनी रानी को कैसे पहचानू ?’ नाइ बड़ा चतुर था वह बोला -‘ रानी तो एक ही है परंतु  वह पोशाक बदल-बदल कर हमारे सामने आ रही है |’ राजा ने नाइ से पूछा -‘ तुझे कैसे पता चला की रानी एक ही है ?’ नाइ बोला की – ‘ मैंने उनके पर रायते का छिटा मारा था | वह तीन बार कपडे बदल कर हमारे सामने आई परन्तु वह छिटा उनके पेर पर तीनो बार लगा था |’

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अगले दिन रानी ने राजा को अपने महल मैं बुलवाया | राजा को अपनी मेज पर बिठाकर खाने के लिए पैन का बीड़ा दिया | पान खाकर राजा पलंग पर लेट गया और रानी उसके पेर दबाने लगी |राजा ने रानी से अपने किये के लिए शमा मांगी और रानी को अपनी राजधानी मैं चलने को कहा | रानी ने कहा -‘ आप मुझे किस मुह से चलने को कह रहे हो ? आप तो मुझे जंगल मैं अकेला छोड़ कर चले गए थे | आप तो दूसरी रानी के के कहने मैं आकर मेरा परित्याग कर चुके थे | यह तो मेरी मौसी का किया हुआ है | उसी के कारन यह सब वैभव मुझे प्राप्त हुआ है वरना आप तो मेरा सर्वनाश कर चुके थे |’

राजा ने रानी को बहुत समझाया | तब रानी बोली की -‘ मैं केवल एक शर्त पर आपके साथ चल सकती हु | आप मेरी मौसी से वरदान मांगेंगे की यह नगरी आपकी राजधानी के पास पहुचा दे | जिससे जब मेरा मन चाहे आपके पास रहू और जब जी चाहे तो मौसी के दिए महल मैं चली जाऊ | मेरी मौसी बड़ी दयालु है | संभव है की वह हमारी बात मान जाये |’

राजा ने दशामाता मौसी से प्राथना की | मौसी ने राजा की बात मानकर दोनों शहरो को पास-पास स्थापित कर दिया | मानो एक दूसरे के ही भाग हो | राजा ने दशामाता की कृपा का फल जानकर शहर मैं ढिंडोरा पिटवाया की उसकी प्रजा दशामाता की पूजा किया करे |

भगवती दशामाता ने जिस प्रकार कुलक्ष्मी पर दया करी, वैसे ही दया सब जनो पर करे |

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