दशामाता व्रत कथा 6

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दशामाता व्रत कथा 6

Dasha Mata Vrat Katha 6

Dasha Mata Vrat Katha 6

एक राजा था | उसकी रानी कोमलांगी थी | वह फूलो की शैय्या पर सोया करती थी | एक दिन फूलो के साथ कच्ची कली भी आ गयी | कच्ची कली के कारण उसे रात को नींद नहीं आई | वह करवटे बदलती रही |

राजा ने पूछा -‘प्रिय !  आज क्या बात है जो तुम्हे नींद नहीं आ रही है ?’ रानी ने बताया की -‘ आज फूलो मैं एक कच्ची कली आ गई है | वह मेरे शरीर मैं चुभ रही है | इसी कारण मुझे नींद नहीं आ रही है |’

राजा ने शयनकक्ष मैं एक दीपक जल रहा था |जिसे ज्योति स्वरुप कहते थे | ज्योति स्वरूप रानी की बात सुनकर हँसा | राजा ने हाथ जोड़कर उससे हँसने का कारण पूछा | ज्योति स्वरूप ने बताया की -‘ अभी तो रानी को कच्ची कली के कारण इतनी तकलीफ हो रही है | कल सवेरा होने पर जब रानी का सिर का बोझा ढोना पड़ेगा तब इनकी क्या गत बनेगी ?’

राजा ने पूछा की -‘ क्या मेरे जीवित रहते ऐसा संभव है ?’ तब दीपक ज्योति स्वरूप न उतर दिया -‘ हाँ, संभव है | तुम्हारे जीते जी संभव है |’ ज्योति स्वरूप की बात सुनकर राजा ने मन मैं सोचा की देववाणी कभी असत्य नहीं होती | होनी को कोन टाल सकता है ? रानी को अवश्य बोझा ढोना पड़ेगा | परंतु यह हो सकता है की यदि मैं इसे एक संदूक मैं बैठाकर समुन्द्र मैं बहा दू तो संभव है की यह बोझा ढोने से बच जाये | क्योकि समुन्द्र मैं डूब जाने पर बोझा ढोने से बच जाएगी |

राजा ने उसी समय रानी से कहा -‘ चलो मैं तुम्हारे मायके मैं छोड़ आऊ | कुछ दिन तुम वही पर रहना |’ रानी बोली -‘ परंतु महाराज ! मेरे मायके मैं तो कोई भी नही है | मैं वहा किसके पास रहूंगी ?’ राजा ने कहा की -‘ तुम्हारे गोत्रज संबंधी वहा बहुत अच्छी दशा मैं है | मैं उन्ही के पास तुम्हे भेज देता हु | ‘ रानी न राजा की बात मन ली | रानी ने बहुमूल्य आभूषण और कीमती वस्त्र धारण किये | तब राजा ने रानी को संदूक मैं बिठाकर नदी मैं बहा दिया |

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वह नदी समुन्दर मैं ऐसी जगह मिलती थी जहा पर राजा के बहनोई का राज्य था | समुन्द्र से मोती निकालने का ठेका राजा के बहनोई ने ले रखा था | वह संदूक बहता-बहता जब राजा के बहनोई के इलाके मैं पहुचा तो उसने मल्लाहो को आज्ञा देकर संदूक को समुन्द्र से बाहर निकलवा लिया | संदूक को उसने अपने महल के शयनकक्ष मैं भिजवा दिया और आदेश दिया की -‘ मेरे पहुचने तक इसे कोई नहीं खोले |’

राजा का बहनोई जो उस जगह का स्वयं राजा था उसके शयनकक्ष मैं संदूक के पहुचते ही रानी को पता चला की इस संदूक को राजा ने समुन्द्र मैं पाया है तो वह फ़ौरन शयनकक्ष मैं आई | उसने पहरेदारो को हट  जाने का कहा | रानी ने संदूक को खोल लिया | उसे संदूक के अंदर सोलह संगार किये एक स्वर्ग सुंदरी मिली | रानी ने अपने मन मैं सोचा की यदि राजा इसको इस दशा मैं देखेंगे तो इसके ही हो जायँगे और मुझे छोड़ देगा | इसलिए उसने उस रानी के सब जेवर कपड़े उतार कर उसे फ़टे पुराने कपडे पहना दिए और संदूक मैं बंद कर दिया |

राजा जब बाहर से महल मैं आये तो उसने रानी को अपने शयनकक्ष मैं बुलाया और रानी से पूछा की -‘ क्या तुमने देखा है की इस संदूक मैं क्या है ?’ रानी ने उतर दिया की -‘ मैंने कुछ नहीं देखा है | मुझे नहीं पता की इस संदूक मैं क्या है ?’

राजा ने रानी के सामने संदूक खुलवाया तो उसे संदूक के अंदर फ़टे पुराने कपडे एक स्त्री दिखाई दी जो भिखारन सी लग रही थी | रानी ने कहा -‘ यह कोई भिखारिन लग रही है | इसको कारखाने मैं भिजवा दिया जाय | वहा लकड़ी ढोकर अपना जीवन निर्वाह करती रहेगी |’ राजा ने रानी के कहे अनुसार उसे कारखाने मैं भिजवा दिया |

एक दिन रानी की सहेलिया नदी मैं स्नान करके दशामाता का डोरा ले रही थी | उनके पास एक डोरा रह गया था | वे यह सोच रही थी की इस डोरे को किसे दिया जाए की उसी समय लकड़ी ढोने वाली रानी वहा आ गई | उन्होंने उसे रोककर पूछा -‘ बहिन हमारे साथ दशामाता का एक डोरा ले लो |’ रानी ने कहा की -‘ मुझे डोरा लेने मैं कोई हर्ज नहीं है परन्तु मुझे तो खाने भर को नहीं दिया मिलता | मैं इस डोरे की पूजा कैसे करुँगी ?’ वे बोली की -‘ तुम इस बात की चिंता मत करो | हम हर रोज इस जगह स्नान करने आया करेंगी | नो दिन तक हम यहाँ पर कथा कहेंगी तुम भी रोज आकर कथा मैं शामिल हो जाया करना | दसवे दिन पूजा होंगी , तब तक दशामाता चाहेंगी तो तुम्हारी दशा बदल जायगी |’ रानी ने दशामाता का ध्यान कर डोरा ले लिया |

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उसी दिन रानी के पति राजा को यह चिंता हुई की रानी को संदूक मैं बंद करके बहा तो दिया था , परंतु पता नहीं उसका क्या हाल होगा ? उसकी खोज खबर लेने के लिए राजा एक नोका पर बैठकर नदी की यात्रा करता हुआ अपने बहनोई के यहाँ पहुचा | संध्या के समय वह अपनी बहिन से बोला -‘ मेरे हाथ पैरो मैं बहुत दर्द हो रहा है | किसी दबाने वाले को बुलाओ |’

तब उसकी बहिन ने लकड़ी ढोने वाली भिखारिन को बुलाकर लाने की आज्ञा दी | उसे कहा -‘ आज रात तुम मेरे भाई के पेर दबा दो |’ वह बड़े संकोच मैं पड़ गई | अपने मन मैं सोचने आज तक मैंने किसी पुरुष को छुआ तक नहीं है | रानी अपने भाई के पेर दबाने के लिए उस पर जोर डाल रही थी | इसलिए लाचार होकर उसने हाँ कर दी |

राजा के पेर दबाते-दबाते रानी को उसके पांव मैं पदम् दिखाई पड़ा | रानी चुपचाप रोने लगी | उसके आंसू राजा के पैरो पर टपक पड़ा | राजा ने उससे पूछा -‘ तुम क्यों रो रही हो ? तुम अपना भेद मुझे बताओ | मेरे द्वारा तुमको कोई हानि नहीं होगी |’

रानी बोली की -‘ जैसा पदम् आपके पेर मैं है वैसा ही पदम् मेरे पति के पेर मैं भी था | पहले के दिनों की याद आ जाने पर मुझे रोना आ गया |’ राजा ने उसे पहचान लिया | राजा बोला-‘ मैं समझ गया | अब तुम्हे पेर दबाने की जरुरत नहीं है | तुम्हारे भाग्य मैं जो लिखा था , वह तुम्हे भोगना ही पड़ा | मैंने उसे टालने के लिए जो उपाय किया था उसका नतीजा उल्टा ही निकला | तुम्हे मेरे जीते जी लकड़िया ढोनी पड़ी |’

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सवेरा हुआ परंतु अथिति राजा सो कर नहीं उठा और न पेर दबाने वाली दासी ही कमरे से बाहर निकली | राजा की बहिन को चिंता होने लगी | थोड़ी देर के बाद दासी कमरे से बाहर निकली और कारखाने मैं काम करने चली गई | रानी ने कमरे मैं जाकर अपने भाई को जगाया | उसका भाई बोला-‘ मेरी तबियत ठीक नहीं है | मेरा सिर दर्द कर रहा है | मैं अभी आराम करना चाहता हु | मेरा मन भी बहुत व्याकुल हो रहा है |’

रानी ने पूछा की -‘ आखिर बात क्या है ? कुछ तो बताओ |’ राजा ने कहा -‘ बड़ी शर्म की बात है | मैंने तुम्हारी भाभी को जानबूझ कर संदूक मैं बैठाकर तुम्हारे पास इसलिए भेजा था की इसे यहाँ आराम से रखा जायेगा | परंतु उसे तो यहाँ लकड़िया ढोनी पड़ रही है | उसके तुमने सारे गहने कपडे उतार कर उसे रास्ते की भिखारन बना दिया |’

उसकी बहिन बोली -‘ मैंने उसे नहीं पहचाना | उसने दासियो को भेज कर उसे चुपचाप अपने पास बुलाया | उसके आने पर बहिन ने अपनी भाभी से काफी मांगी और उसके पेर पकड़ लिए |’ कुछ दिनों तक राजा अपने बहनोई-बहिन के रहकर रानी को साथ लेकर राजधानी मैं लोट आया |

रानी ने अपने महल मैं पहुचकर सुहागिनों को न्योता भेजा | बड़े धूमधाम से दशामाता के डोरे की पूजा की और नगर मैं ढिंडोरा पिटवाया गया की -‘ आज से अमीर-गरीब सब दशामाता का डोरा लिया करे और श्रद्धापूर्वक पूजा किया करे | जिसके पास पूजन पारण के लिए धन की कमी हो तो वह महल से ले जाया करे |’

जिस प्रकार रानी के दिन दशामाता ने फेरे , वैसे ही वह सब की दशा को ठीक करे |

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