दशामाता व्रत कथा 9

दशामाता व्रत कथा 9

एक गांव मैं एक बुढ़िया ब्राह्मणी रहती थी | वह बहुत गरीब थी | उसके एक बेटा था | एक दिन वह अपने बेटे से बोली -‘ बेटा ! कुछ ऐसा काम करो जिससे चार पैसे की आमदनी हो और हम दोनों का जीवन निर्वाह हो | अब मेरे तो बुढ़ापे के कारण हाथ पैरो ने जवाब दे दिया है |’ तब उसका लड़का गांव वालो के जानवर चराने लगा |

एक दिन लड़का पशुओ को पानी पिलाने नदी पर ले गया | वहा पर महिलाये स्नान करके दशामाता को डोरा ले रही थी | उनके पास एक डोरा बच गया था | उनमे से एक स्त्री ने कहा की -‘ इस लड़के से पूछो की यह किसका है ? ‘ तब एक स्त्री लड़के के पास जाकर पूछने लगी -‘ तुम्हारे घर मैं कोन-कोन है ?’ लड़के ने बताया की -‘ केवल मेरी बूढी माँ है |’ स्त्रियों ने लड़के को एक डोरा देते हुए कहा की -‘ तुम इसे ले जाकर अपनी माता को दे देना और कहना की इसका पूजन और व्रत करे | हम तुम्हे सीधा और पूजा की सामग्री भी देते है | इसे भी अपने माता को दे देना |’

लड़के ने उनसे डोरा ली लिया | फिर सब स्त्रियों ने उसे सीधा भी दिया | लड़का उस सामान को लेकर घर आया | उसने दरवाजे से ही माँ को पुकार कर कहा -‘ गठरी को उतार लो | मैं बोझ से दबा जा रहा हु |’ उसकी माँ बहुत प्रसन्न हुई | माँ ने बेटे से पूछा -‘ यह सब कहा से लाये हो ?’ लड़के ने माँ को सब समाचार सुनाकर दशामाता का डोरा भी दे दिया |

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बुढ़िया ने डोरे को लेकर माथे से लगाया और उसी दिन से व्रत करने लगी | नो दिन तक कथा कहानी कहती रही | दसवे दिन उसने डोरे की पूजन जी तयारी शुरू की | वह देहरी के बाहर गोबर से लीप रही थी की उसी समय एक बहुत ही गरीब बुढ़िया आकर बोली की -‘ क्या कर रही हो बहिन ?’ उसने जवाब दिया की -‘ आज मेरे घर पर दशामाता का पूजन है , इसलिए लिप रही हु |’ उस बुढ़िया रूपी दशामाता ने है की -‘ मुझे बहुत प्यास लगी है | थोड़ा-सा पानी पिला दे ‘ इस पर लड़के की माता बोली -‘ मैं तो इस मिटटी के बर्तन से पानी पीती हु | मेरे यह लोटा-लुटिया कुछ नहीं है ? तुम को पानी किस मैं भर के दू ? एक कटोरी ही मेरे घर मैं है | पता नहीं वह कहा पड़ी होगी | जरा तुम ठहरो , मैं कटोरी ले आऊ | तब तुमको पानी पिलाऊंगी | ‘

बुढ़िया हाथ धोकर अंदर कटोरी लेने गई | इसी बिच दशामाता जिन्होंने बुढ़िया का रूप धारण कर रखा था | उसके मटके रखने की जगह पर एक सोने का घड़ा रख कर अंतर्ध्यान हो गई | बुढ़िया कटोरी लेकर मटके के पास गई | वहा सोने का घड़ा देखकर घबराई | वह मन मैं सोचने लगी की -‘ मुझ पर बुढ़ापे मैं चोरी का नाम लगेगा | मैं चोर कहलाउंगी |’ वह इस चिंता मैं दशामाता रूपी बुढ़िया को खोजने निकली | तब तक उसका लड़का भी घर आ गया था | उसने माँ से पूछा -‘ तुम किसे खोज रही हो ?’ उसने बताया -‘ अभी शीर्ण अवस्था वाली बुढ़िया आई थी और यहा सोने घड़ा रखकर न जाने कहा चली गई ?’

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लड़के ने बताया -‘ वह ही तो दशामाता थी | उन्होंने तुमको यहा घड़ा दिया है | दुबारा फिर कभी वह आये तो उसके स्वागत मैं कोई कमी नहीं रखना और उनकी आज्ञा का पालन करना | जब तुम नदी पर नहाने जाओ तो तुम्हे नदी घाट पर जो भी चीज मिले उसको दशामाता का दिया हुआ प्रसाद समझकर ले लेना | किसी से यह पूछताछ मत करना की यह चीज किसकी है ? यह कहा से आई है ?’

बुढ़िया नदी मैं नहाकर बाहर निकली तो उसे सोने का घड़ा भरा दिखाई दिया और उसके पास ही अच्छे वस्त्र रखे थे | बुढ़िया ने कपड़ो को पहन लिया और घड़े को हाथ मैं लेकर चलने की तयारी थी की चार कहार एक डोली लेकर उसके पास आये | कहारो ने उसे डोली मैं बैठने को कहा बुढ़िया जब घर पहुची तो उसने देखा की वहा तो एक आलीसान महल खड़ा है |

बुढ़िया महल के अंदर चली गई | वहा उसने श्रद्धापूर्वक और भक्तिभाव से दशामाता के डोरे का पूजन किया और हाथ जोड़कर वरदान माँगा की -‘ जिस प्रकार तुमने मुझे सम्पति दी है , उसी प्रकार मेरे घर मैं एक सुशिल बहु और आ जाये | तभी यह सब शोभा देगा |’

कुछ दिनों बाद लड़के का विवाह हो गया और बहुत ही सुन्दर व् सुशिल बहु बुढ़िया के घर आ गई | बुढ़िया ने दोबारा दशामाता से वर माँगा की -‘ जैसे मेरे बहु-बेटे सुशील और सज्जन है उसी प्रकार के मैं पोत्र पाऊ|  ‘ कुछ दिनों बाद बुढ़िया के यहाँ एक पोत्र रूपी रत्न पैदा हुआ |

एक दिन बुढ़िया ने अपनी बहु को पास बैठा कर समझाया की -‘ मेरी यह सब सम्पति दशामाता की प्रदान की हुई है | उन्ही की कृपा से तुम इस घर मैं आई हो | मेरे नहीं रहने के बाद यदि कोई मेले-कुचेले कपड़े धारण किये बुढ़िया तुम्हारे घर पर आये तो उसे आँचल के छोर से पोछ डालना , घिन मत करना | उससे प्राथना करना यह सब आपका ही दिया हुआ तो है | जब भी दशामाता का डोरा लेना हो तब उसको तुम भी अवश्य लेना और श्रद्धापूर्वक उसका पूजन करना | जब भी तुम्हारे ऊपर संकट के बदल घिर आए तो सुहागिनों को न्योतना | दशामाता की कृपा से तुम्हारी सब इच्छाए पूरी होंगी |’

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कुछ दिनों के बाद बुढ़िया का स्वर्गवास हो गया | दशामाता ने सोचा की -‘ बुढ़िया के घर चलकर देखना चाहिए की उसकी बहु सास के वचनों का पालन करती है या नहीं |’ एक दिन दशामाता ने वर्द्धा भिखारिन का वेश धरकर उसके घर गई | उसे देखते ही बहु खड़ी हो गई | उसके पाव छुवे और बालक को उसकी गोद मैं डाल दिया |

उसकी श्रद्धा भक्ति से दशामाता बहुत ही प्रसन्न हुई | उन्होंने आशिर्वाद दिया की -‘ तेरी धर्म बुद्धि है | भगवान तेरा सदैव कल्याण करेंगे | भंडार भरपूर रहेगा | तू जो इच्छा करेगी वह तुझे अवश्य प्राप्त होगी |’

दशामाता ने जैसी कृपा बुढ़िया ब्राह्मणी पर की , वैसी ही कृपा भक्त जनो पर बनी रहे |

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