दशामाता व्रत कथा 7

दशामाता व्रत कथा 7

एक व्रक्ष नर और मादा दो पक्षी रहते थे | उनके कोई संतान नहीं थी | अन्य पक्षी मादा पक्षी को बोझ कहकर घ्रणा करते थे |

मादा चिड़िया बच्चे न होने के कारण बहुत दुखी रहती थी | एक दिन वह अपनी स्थिति पर विचार करती हुई अकेली नदी पर पानी पीने गई | वहा पर स्त्रियां दशामाता का डोरा ले रही थी | उनका एक डोरा बच गया था | उन्हें कोई उच्च वर्ग की स्त्री नहीं दिखाई दी जिसे वह डोरा दे देती | उन्होंने सोचा की इस चिड़िया के गले मैं इस डोरे को बांध देते है | यह यहाँ रोज आकर कथा सुन लिया करेगी | इसे पूजन की विधि बता देंगे तो यह भी पूजन के दिन पूजा कर लेगी | तदनुसार उन्होंने चिड़िया के गले मैं दशामाता का डोरा बांध दिया और उसे समझा दिया की -‘ प्रतिदिन नो दिन तक यहाँ आकर कहानी सुन लिया करो | दसवे दिन इक्कीस गहु के दाने लाकर उनमे से एक दाना दशामाता के नाम से नदी मैं डाल देना और बाकि २० दाने तुम स्वयं खा लेना |’ चिड़िया ने नो दिन तक नियमपूर्वक दशामाता की कहानी सुनी | दसवे दिन स्त्रियां द्वारा बताई विधि के अनुसार डोरा एव एक गहु का दाना नदी मैं डालकर पारण किया |

कुछ दिनों के बाद उस चिड़िया के भी बच्चे हो गए | अन्य चिड़ियों को बड़ा आश्चर्ये हुआ की इसे तो बच्चे होते ही नहीं थे | अब बच्चे कैसे होने लगे ? वह चिड़िया बोली -‘ जब मुझे बच्चे नहीं होते थे तो सब मुझे बाँझ कहकर दुत्कारती थी | अब मुझे दशामाता की कृपा से बच्चे होने लगे है |’ चिड़ियों के पूछने पर उसने दशामाता का डोरा लेने का सारा हाल कह सुनाया और पूजा की विधि का भी वर्णन सुना दिया | तब से जंगल की सारी चिड़िया दशामाता का व्रत करने लगी |

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