दशामाता व्रत कथा 2

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दशामाता व्रत कथा 2

Dasha Mata Katha 2

Dasha Mata Katha 2

एक घर में सास-बहु रहती थी | बहु का पति परदेश में गया था | एक दिन सास ने बहु से गांव में से आग ला कर भोजन पकाने को कहा | बहु गांव में आग लाने गयी पर किसी ने भी उसे आग नहीं दी और सभी ने  कहा की -‘ जब तक दशामाता की पूजा नहीं हो जाती तब तक आग नहीं मिलेगी | ‘ बेचारी बहु खाली हाथ घर लोट आई | उसने सास को बताया की – ‘ गांव भर में आज दशामाता की पूजा है इसलिए कोई आग नहीं दे रहा है |’

शाम हो जाने पर सास आग लेने गांव में गयी तो स्त्रियो ने उसे आराम से बैठाया और कहा की -‘ सुबह तुम्हारी बहु आग लेने आई थी | परंतु हमारे यहा पूजा नहीं हुई थी इसलिए आग नही दे सकी |’ सास आग लेकर अपने घर पहुची ही थी की एक आदमी बछड़ा लिए आया और उसके पीछे एक गाय थी | स्त्री ने उससे पूछा की – ‘ यह गाय का पहला बच्चा है क्या ?’ आदमी ने उत्तर दिया -‘ हां |’ उसने फिर पूछा की -‘ बछड़ा है या बछिया ?’ उसने जवाब दिया की-‘बछड़ा है |’

सास ने घर जाकर बहु से कहा -‘ आओ ! हम दोनों भी दशामाता का डोरा ले और व्रत करे |’ दोनों सास-बहु ने डोरा लिया | सवेरे से व्रत आरम्भ किया | नो व्रत पुरे हो जाने पर दसवे दिन डोरे की पूजा की | सास बहु दोनों ने मिलकर गोल-गोल दस-दस अर्थात कुल बिस फेरे बनाए | इक्कीसवाँ  बड़ा फेरा गाय को दिया | पूजन समाप्त होने पर सास- बहु दोनों पारण करने बैठी |

उसी समय बुढ़िया के बेटे ने परदेस से लौटकर दरवाजे पर आवाज लगाई |

आवाज सुनकर माँ ने मन में सोचा की- ‘ क्या हुआ थोड़ी देर बीटा दरवाजे पर ही खड़ा रह जायगा | में पारण करने के बाद दरवाजा खोलूंगी |’ इधर बहु ने आवाज सुनी तो उसे रुकने का साहस नहीं हुआ | अपनी थाली का अन्न इधर-उधर करके झट से पानी पीकर उठ खड़ी हुई | उसने जाकर दरवाजा खोला | पति ने उससे पूछा की-‘अम्मा कहा हे ?’ बहु ने उत्तर दिया की -‘वह तो अभी पारण कर रही है |’ तब पति बोला -‘में तुम्हारे हाथ का जल भी नहीं पिऊंगा क्योंकि में बारह बरस से घर आया हु | इतने दिनों न जाने तुम किस प्रकार रही होगी ” अम्मा आएंगी , वह जल लाएंगी , तब ही जल  पिऊंगा |’ यह सुनकर स्त्री चुपचाप बेथ गयी |

इतने में उसकी अम्मा पारण कर अपनी थाली धोकर पि चुकी | तब वह लड़के के पास गयी | लड़के ने माँ के पैर छुवे |अम्मा उसे आशिर्वाद देकर बेटे को घर में ले आई | माता ने थाली परोस कर रखी | बेटा भोजन करने लगा | उसने हाथ में पहला ग्रास ही लिया था की फेरो के वे टुकड़े जो बहु ने अपनी थाली में फेक दिए थे ,अपने आप बेटे के सामने आने लगे | बेटे ने माँ से पूछा -‘ यह सब क्या हो रहा है ?’ माँ बोली -‘ में क्या जानू बेटा ? बहु जाने |’

यह सुनकर बेटा आग बबूला होकर बोला -‘ ऐसी बहु मेरे किस काम की ? ‘ जिसके चरित्र की तुम साक्षी नहीं हो | उसको में घर में नहीं रख सकता इसे अभी घर से निकालो यदि ये घर में रहेगी ,तो  में घर में नहीं रहूँगा |’

माँ ने बेटे को व्रत के पारण का सब हाल बताकर हर तरह से समझाया परन्तु वह मानने को तैयार नहीं हुआ | वह यही कहता रहा की इसे घर से बहार करो तो में रह सकता हु | माँ ने सोचा बहु को थोड़ी देर के लिए बाहर कर देती हु | जब लड़के का गुस्सा उत्तर जायेगा तब बहु को बुला लुंगी | बुढ़िया ने बहु से कहा -‘ देहरी के बाहर जाकर पेड़ के निचे थोड़ी देर के लिए खड़ी हो जा |’

जब बहु पेड़ के निचे खड़ी हुई तो पेड़ बोला -‘ मुझ से हटकर खड़ी हो | मै दशामाता के विरोधी को छाया नहीं दे सकता |’ इस पर वह वहा से चलकर घड़ौची के पास गयी घड़ौची बोली -‘ मुझसे हटकर खड़ी हो | मुझ पर इतना भार घडो का नहीं है जितना तेरा हे | ‘ वह यह से हटकर घूरे के ढेर पर खड़ी हो गयी |घूरे का ढेर बोला -‘मुझ पर इतना भार कूड़े का नहीं है जितना तेरा हे | चल यहा से हटकर कही और खड़ी हो जा |’

इस प्रकार उसे कही भी खड़ा नहीं होने दिया गया | वह अपने मन में बहुत दुखी हुई | वह जंगल मै चली गयी | जंगल में भूखी-प्यासी घूमती फिरती एक सूखे कुवे में गिर पड़ी | वह उसमे गिरी परंतु उसे चोट नहीं आई | वह निचे बैठ गयी |

अचानक राजा नल वहा शिकार खेलते-खेलते वहा पहुच गए | उनके साथी बिछुड़ गए थे | वह प्यास के कारण उसी कुवे पर आये जिसमे वह स्त्री बैठी थी | राजा नल के भाई ने कुवे में पानी के लिए लोटा डाला तो उस स्त्री ने लोटे को पकड़ लिया | भाई ने नल से कहा की -‘ इस कुवे में किसी ने लोटा पकड़ लिया हे| ‘

तब राजा नल ने कुवे पर आकर कहा की -‘तुम यदि पुरुष हो तो मेरे धर्म के भाई हो और यदि स्त्री हो तो मेरी धर्म की बहन हो तुम जो भी हो बोलो | में तुम्हे बाहर निकाल लूंगा |’ स्त्री ने आवाज दी | राजा ने उसे बाहर निकाल लिया तथा हाथी पर बैठा कर राजधानी ले आया |

महाराज को शिकार से लौटकर महलो की और आते देखकर सवको ने महारानी को महाराजा के आने की सुचना दी | सेवको ने एक स्त्री को हाथी पर बैठा देखकर रानी को बताया की -‘ महाराजा एक नई रानी भी साथ ला रहे हे |’ यह जानकर रानी बड़ी दुखी हुई | इतने में महाराज भी वहा आ पहुचे | रानी ने हाथ जोड़कर विनती की -‘महाराज | मुझसे ऐसे क्या गलती हो गयी जो मेरे रहते आप ने दूसरा विवाह कर लिया ?’

राजा नल ने हस कर उत्तर दिया -‘ वह तुम्हारी सोत नहीं ननद है | मेरी धर्म की बहन है | तुम्हे उसके साथ अपनी सगी ननद की तरह बर्ताव करना चाहिए |’ यह सुनते ही महारानी का मुख प्रसन्नता से कमल की भाती खिल उठा | वह बोली -‘ अब तक में ननद का सुख नहीं जानती थी | अच्छा हुआ जो मुझे भाग्य से ननद भी मिल गयी |’ राजा ने उसका नाम मुह बोली बहिन रखा और उसके लिए अलग महल बनवाया | उसके दिन अब सुखपूर्वक बीतने लगे |

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एक दिन राजा की घोड़ी का बच्चा हुआ तो राजमहल की स्त्रियां बधाई गीत गाने लगी | मुह बोली बहन ने अपने दासियो से कहा -‘ बाहर जाकर पता करो की किस बात बधाई गयी जा रही है ?’ दासियो ने बताया -‘ महाराजा की घोड़ी ने अच्छी घडी में एक उत्तम बछड़े को जन्म दिया हे | उसकी बधाई गायी जा रही |’ मुह बोली बहिन ने पूछा -‘ क्या घोड़ी ने पहली बार जन्म दिया हे ?’ दासियो ने उत्तर दिया -‘ हां|’

तब मुह बोली बहिन ने महारानी के पास जाकर कहा -‘ आओ भाभी रानी ! हम तुम दोनों दशामाता का डोरा ले |’ रानी ने पूछा -‘ डोरा क्या चीज हे ? मुझे समझाओ |’ वह बोली -‘ दशामाता के व्रत का यह नियम है  की पहले-पहल जब गाय या घोड़ी या स्त्री के प्रसव की खबर सुने तब डोरा लेकर व्रत आरम्भ करते हे | नो व्रत करने के बाद दसवे दिन डोरे का पूजन करके विसर्जित करते हे |’ इसी के साथ उसने पारण का नियम भी बताया | तब महारानी बोली -‘ तुम्हारा व्रत तुमको फले | मै पूड़ी और दूध की खीर खाने वाली रानी -महारानी भला बनफ़रा , गोले की पपड़ी खाकर कैसे रह सकती हु ? ऐसा कहना खाये मेरा दुश्मन| ‘

वह बोली -‘ भाभी ! मुझे जो चाहे कह लो | परंतु व्रत के संबंद में कुछ मत कहो | में इसी व्रत के उलघन के कारण मारी-मारी फिरती आपके देश में आ गयी हु |’ महारानी ने उदासीनता के साथ कहा -‘ मुझे क्या पड़ी हे ? तुम्हे जो अच्छा लगे वह करो | में मना तो नहीं कर रही हु |’

मुह बोली बहिन ने श्रद्धा पूर्वक डोरा लिया | नो दिन तक व्रत किये | दसवे दिन विधिवत पूजन किया | गोला ,फरा बनाए और संध्या को पारण करने बैठी | उसी समय उसके पति को अचानक कुछ प्रेरणा -सी हुई और वह अपनी माता से आज्ञा लेकर अपनी पत्नी को ढूंढने चल दिया |

घूमता फिरता वह राजा नल की राजधानी ने पहुच गया और अपनी अपनी पत्नी का पता लगाने लगा |

उसने एक कुवे पर कुछ ओरतो को बातें करते देखा | एक कह रही थी -‘राजा की मुह बोली बहिन बहुत ही सुन्दर ही स्त्री हे | आजकल उसी का किया हुआ सबकुछ होता हे |’ दूसरी स्त्री बोली -‘वह सुन्दर होने के साथ साथ धर्मात्मा भी हे  जब से आई हे तभी से उसने सदावर्त खोल रखा हे | उसके दरवाजे से कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता|’

तीसरी स्त्री बोली -‘वह जैसी धर्मात्मा हे , वैसी सदाचारणी भी हे |’ चौथी स्त्री बोली -‘ वह सदाचारणी और सर्वप्रिय भी हे | सारी प्रजा उससे खुश हे |’ पाचवी स्त्री बोली-‘ यह सब तो सही हे परन्तु अब तक यह पता नहीं चला की वह कोन हे और कहा की रहने वाली हे ?’

उन ओरतो की बात सुनकर वह साधु के वेश में राजा नल की मुह बोली बहिन के महल के द्वार पर जा पंहुचा | वहा उसने भिक्षा के लिए आवाज लगाई तो द्वारपाल उसे भिक्षा देने लगा | उसने द्वारपाल के हाथो से भिक्षा लेने से मना कर दिया और बोला -‘ भिक्षा देने वाली स्वामिनीं के हाथ से ही भिक्षा ग्रहण करूँगा नहीं तो अपने रास्ते चला | ‘

तब द्वारपाल ने उससे कहा – ‘इस समय वह दशामाता का व्रत करके पारण कर रही हे | पारण समाप्त होने के बाद ही वह तुमको भिक्षा दे सकती है | तब तक तुम इंतजार करो |’

वह चुपचाप बैठ कर इंतजार करने लगा | पारण कर लेने के बाद वह मुठी भर मोती लेकर आई | परन्तु सामने अपने पति को पल्ला फैलाये देखकर वह मुस्कराती हुई लोट गयी | दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया था |

महारानी ने मुह बोली ननद को मुस्कराते देखकर कहा -‘ जब से तुम आई हो आज तक मैंने मुस्कराते नहीं देखा | आज इस साधु को देखकर हँसने का क्या कारण हे ?’

मुह बोली बहिन ने उत्तर दिया की -‘ वह साधु हमारे घर का है |’ रानी ने पूछा -‘तब वह ऐसे क्यों आया हे ?’ उसने कहा -‘ वह अभी मेरा पता लगाने आया है |’ महारानी ने राजा नल से कहा -‘ तुम्हारी मुह बोली बहिन के घर के लोग आये हे |’ राजा ने कहा -‘ उनसे कह दो की अभी यहा से घर जाकर वहा से हमारी हैसियत से आये | तब में बहिन की विदाई करूँगा |’

राजा नल की मुह बोली बहिन का पति घर जाकर अपनी माँ से बोला -‘ तुम्हारी बहु राजा नल के यहा उसकी बहिन बनकर रह रही हे | वह रोज सदाव्रत करती है  और नियम धर्म से दिन बिताती हे |’ तब उसकी माता ने उसे आज्ञा दी की -‘बहु को ले आओ| ‘ वह डोली ,पीनस ,बाजे-गाजे ,कहार आदि के साथ यथाचित सज-धज कर राजा नल की राजधानी को चल दिया |

राजा ने उसका यथोचित आदर सत्कार किया और कुछ दिन मेहमानी में रखकर विधिपूर्वक बहिन की विदाई की | जब वह महल के बाहर निकल चलने लगी तो महल भी उसके पीछे -‘पीछे चलने | तब महारानी बोली -‘ ननद जी !’ तुम चली और मेरा महल भी ले चली | जरा पीछे मुड़कर तो देखती जाओ |’ ज्यो ही उसने मुड़कर पीछे की और देखा तो राजा का सम्पूर्ण राजसी वैभव अचानक लुप्त हो गया |

राजा की मुह बोली बहिन तो अपने पति के साथ आनंद से रहने लगी परन्तु राजा नल व रानी का यह हाल हो गया की वे दोनों कमरी-कथरी ओढ़े फिरने लगे | उनके भोजनालय में पते खड़-खड़ाने लगे | राजा नल ने रानी से कहा -‘अब हमे यहा से कही दूसरी जगह चले जाना चाहिए |’ रानी पतिव्रता स्त्री थी | उसने राजा की आज्ञा मान ली |

चलते-चलते वे एक गांव के पास पहुचे | वहा पर बेरी के पेड़ पर बेर लगे हुए थे | राजा-रानी दोनों भूखे थे |उन्होंने बेरो को उठाया तो बेर लोहे के हो गए | इस प्रकार राजा-रानी जिस वस्तु को भी हाथ लगाते वह कंकड़ -पत्थर में बदल जाती थी | इतने पर भी राजा-रानी आगे बढ़ते गए | रास्ते में उन्हें एक व्यापारी मिला | व्यापारी ने राजा-रानी को पहचान लिया |उसने राजा-रानी के भोजन के लिए सेर भर आटा दिया |वे आटा लेकर नदी के किनारे गए | वहा रानी भोजन बनाने लगी और राजा नल स्नान करने चले गए |उस नदी में मछवारे मछलिया पकड़ रहे थे | मछेरों ने राजा को चार मछलिया दी | रानी ने मछलिया भूनकर रोटियां बना ली | राजा नल भोजन करने बैठे तो रोटियां ईठ में परिवर्तित हो गई और मछलिया उछलकर नदी में चली गई |

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वहा से चल कर राजा-रानी अपनी मुह बोली बहिन के यह गए | बहिन को जब पता चला की भाई भाभी आये हे तो उसने सेवको से पूछा -‘ कैसे आये हे ?’ सेवको ने कहा की -‘भिखारियों के हाल में आये है ‘| यह सुनकर उसे बड़ी लज्जा आई | उसने राजा-रानी को एक कुम्हार के यह ठहरा दिया  | शाम को थाल सजाकर बहिन स्वयं भाभी से मिलने कुम्हार के घर गयी |उसने भाभी के सामने थाल रखा तो भाभी ने कहा की -‘इस थाल में जो कुछ भी हे उसे कुम्हार के चक्के के निचे रख दो और चली जाओ |’

ननद थाल का समान चक्के के निचे रखकर चली गयी | थोड़ी देर में राजा ने आकर रानी से पूछा -‘ कहो बहिन आई थी ? क्या लाई थी ?’ रानी ने कहा -‘ आई तो थी पर जो कुछ लायी थी मैंने इस चक्के के निचे रखवा दिया है |’ राजा ने वहा देखा तो वहा कंकड़ -पत्थरो के सिवा कुछ भी नहीं था | राजा को समझते देर न लगी की यह सब बुरी दशा के कारण है | भला वह मेरे लिए कंकड़-पत्थर क्यों लायेगी?

अब राजा रानी वहा से चलकर अपने मित्र के घर गए | मित्र को लोगो से पता चला तो उसने उनसे पूछा -‘कैसे आना हुआ ?|’ उन्होंने उत्तर दिया -‘भिखारियों के हाल में आए है |’

मित्र ने दुखी होकर कहा-‘ कोई बात नहीं | जैसे आये वैसे अच्छे आये , आखिर मित्र हे | उन्हें महलो में ले आओ | ‘ मित्र ने उन दोनों का स्वागत किया | स्वादिष्ट भोजन कराया | एक कमरे में उनके लिए पलंग बिछवा दिए | उस कमरे में एक खुटी पर नोलखा हार टंगा था | आधी रात के समय राजा तो सो गए परंतु रानी जाग रही थी | रानी ने देखा की हार वाली खुटी के पास दिवार में एक मोर का चित्र बना हुआ हे | मोर धीरे-धीरे हार को निगल रहा हे | रानी ने राजा को जगाकर वह द्रश्य दिखाया |

राजा ने सोचा यहा से चुपचाप भाग चलना चाहिए नहीं तो सवेरे चोरी का कलंक लगेगा | तब मित्र को क्या मुख दिखाएंगे ? बचारे राजा और रानी में ही उठकर जंगल की तरफ चले गए |

दोनों चलते चलते एक दूसरे राजा की राजधानी में पहुच गए | वहा अतिथि और भिख्सुओ को सदावर्त दिया जाता था | वे दोनों भी सदावर्त लेने गए | परंतु उस समय सदावर्त बंद हो चूका था |वहा के अधिकारियो ने कहा -‘ यह लोग न जाने कहा के अभागे आये हे की इन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं बचा फिर भी इन्हें एक एक मुठी चने दे दो | ‘ उन्होंने इस प्रकार से अनादर और कड़वी बातो सहित दान लेना अस्वीकार कर दिया | वे दानाध्यक्ष की निंदा करते हुए बोले की -‘ ऐसी कंजूसी है तो सदावर्त देने का नाम ही क्यों करता हे ?’

दानाध्यक्ष बोला -‘ यह तो बड़ा घमंडी भिक्षुक लगता है | भीख भी मांगता है और गाली भी देता है | इनको हवालात मैं डाल दो |’ इस प्रकार दोनों को एक कोठरी में बंद कर दिया गया | एक -एक मुठी चने दोनों को खाने के लिए मिलने लगे|

जिस कोठरी में राजा-रानी बंद किया गया था उसी के पास आम रास्ता था | एक जमादारनी राजा की घुड़साल साफ कर उसी रास्ते से निकला करती थी | एक दिन वह बहुत देर से निकली | रानी उससे पूछने लगी की -‘ आज तुम्हे इतनी देर कैसे हो गयी ?’ वह बोली की -‘ आज राजा की घोड़ी के बछड़ा हुआ था | उसकी टहल में देर हो गयी ‘ रानी ने पूछा की -‘ घोड़ी का पहला प्रसव है क्या ?’ जमादारनी ने बताया -‘पहली बार |’ रानी ने फिर पूछा -“बछेड़ा हुआ है या बछेड़ी ?” जमादारनी ने बताया की -‘ बहुत अच्छा बछेड़ा हुआ है |’

यह सुनकर रानी ने राजा से कहा -‘ एक बार मैंने तुम्हारी मुह बोली बहिन के डोरे का अनादर किया था | उसी दिन से हमारी दशा बदल गई | में आज दशामाता का डोरा लेना चाहती हु |’ राजा ने कहा -‘परन्तु यह पूजा की सामग्री कहा से आयगी ? उसके नियम धर्म का पालन कैसे होगा ?’ रानी ने उत्तर दिया -‘ दशामाता ही सब कुछ करेगी | में तो उन्ही का नाम लेकर डोरा लेती हु | फिर जो होगा देखा जायेगा |’

रानी ने नो तार राजा की पगड़ी से और एक तार अपने आँचल का लेकर अपना डोरा तैयार किया और उसे समय से व्रत करने लगी | थोड़ी देर में ही वहा का राजा अपनी घोड़ी को देखने के लिए उसी रास्ते से निकला | राजा ने नल दम्पति को देखा कोठरी में बंद देखकर पूछा की-‘वे लोग कोन है और इनका क्या अपराध हे ?’ पहरेदारो ने कहा -‘ ये लोग भिक्षा लेने आये थे | ये आपको आशिर्वाद देने के बदले गालिया देते थे | इसी कारण दानाध्यक्ष ने इन लोगो को कैद मैं डाल दिया है |’

राजा ने कहा-‘ यह तो इनका कोई अपराध नहीं है| इनको मनवांछित भिक्षा नहीं मिली होगी इसलिए ये गालिया देने लेंगे होंगे | इनको संतुष्ट करना चाहिए था ना की कैद में डाल देना चाहिए | इनको अभी रिहा करो |’ राजा की आज्ञा से उसी समय दोनों को कोठरी से बाहर निकाला गया | राजा उनके पांव में पदम् और माथे पर चंद्रमा देखकर पहचान गया की यह तो राजा नल और रानी दमयंती है | इस पर उसने दोनों हाथो से हाथ जोड़कर शमा मांगी और हाथी पर बैठा कर अपने महल में ले गया |

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कुछ दिन तक राजा के यहाँ रहकर उन दोनों ने पुरे राजसी ठाट के साथ अपनी राजधानी की और प्रस्थान किया | रास्ते में वे पहले अपने मित्र के यहाँ गए | मित्र ने राजा नल की आने की खबर सुनकर लोगो से पूछा -‘ मित्र आये तो कैसे आये ?’ लोगो ने कहा -‘ अब की बार तो राजसी ठाट -बाट के साथ हाथी , घोड़े ,डंका,निसान,पालकी ,पीनस  एव फ़ौज को साथ लेकर आये हे |’

मित्र ने कहा -‘ अच्छी बात हे , आने दो | मेरे लिए तो जैसे तब थे वैसे ही अब भी है| आखिर है तो मित्र ही | ‘ राजा-रानी मित्र के महल में गए |मित्र ने उनको आदर सत्कार के साथ उसी स्थान पर ठहराया | जिस स्थान पर पहले ठहराया था |आधी रात के समय जब राजा सो रहे थे  और रानी पैर दबा रही थी तब रानी ने देखा की मोर का चित्र जो पहले हार को निगल गया था ,उसे उगल रहा है | रानी ने राजा को जगाकर यह दर्शय दिखाया | राजा नल ने अपने मित्र को बुलाकर यह दिखाया |

मित्र बोला की -‘ मैंने तब भी तुमको चोर नहीं समझा था और न अब समझता हु | यह दर्शय तुम्हारी बुरी दशा का फल है | आप निश्चित रहिये , मेरे मन में कोई मेल नहीं हे |’ मित्र के यहाँ से चलकर राजा-रानी अपनी मुह बोली बहिन के यहाँ गए | उसने सुना राजा भईया आ रहे है तो उसने लोगो से पूछा -‘ कैसे आ रहे है ?’ लोगो ने कहा -‘ जिस प्रकार राजा का आना चाहिए , उसी प्रकार से आ रहे है |’

उसने कहा -‘ उनको मेरे महल ले आओ |’ जब राजा नल का हाथी बहिन के महल की और बड़ा तब रानी ने कहा -‘ आप अपनी बहिन के घर जाइये | में तो उसी कुम्हार के घर रहूंगी जिसके पहले ठहरी थी |’ राजा ने कहा -‘ जिस कारण इतने दुःख उठाये , तुम फिर उससे झगड़ा मोल लेना चाहती हो | यह तुम अच्छा नहीं कर रही हो |’  परन्तु रानी नहीं मानी |

वह कुम्हार के घर ही ठहरी | राजा बहिन के घर चले गए | शाम को राजा की बहिन भाभी के लिए थाल सजाकर कुम्हार के यहाँ आई | उसने भाभी के सामने थाल रख दिया | भाभी सोने-चांदी के गहने उतार-उतार कर रखने लगी और कहने लगी -‘ खाओ रे | मेरे सोने-चांदी के गहनों खाओ | हम भूखे नंगे क्या खाएंगे |’ यह उलाहना सुन ननद बोली -‘ यह उलाहना किसे देती हो ?मुझ से उस समय जो हो कुछ हो सका वो उस समय लायी थी , वही अब भी लायी हु | विश्वास न हो तो चक्के के निचे अब भी देख लो | ‘ सचमुच चक्के के निचे देखा तो वहा पर माणिक-मोतियों का ढेर लगा था | रानी यह सब देखकर सन्न रह गयी | वह बोली -‘ ननद जी ! तुम्हारा कोई दोष नहीं है | यह तो हमारी बुरी दशा का परिणाम था |’ रानी ने ननद का लाया सब सामान तथा उनमे अपनी तरफ से कुछ और जवाहरात मिलाकर ननद को वापस कर दिया , परंतु ननद को पूजा का न्योता देना भूल गयी |

वहा से चलकर राजा सूरा गाय के पास आये | गाय ने सेना सहित राजा को भर पेट दूध पिलाया | वहा से आगे चलकर वे नदी के तट पर पहुचे तो वहा पड़ाव डाला |भोजन बनवाया गया | जब राजा भोजन करने बैठे तो उसी समय नदी में उछल कर गिरी हुई भुनी भुनाई मछलिया अपने-आप थाली में गिर पड़ी |व् रोटियां जो ईट बन गयी थी फिर से रोटियां बन गयी |

राजा ने कहा -‘ यह सब क्या हो रहा है ? कुछ समझ में नहीं आता |’ रानी ने बताया की -‘ ये रोटियां और मछलिया वे ही है जो उस दिन हमे नसीब नहीं हुई थी | मैं यदि आप से उस समय कहती की तली हुई मछलिया जल मैं उछल गयी और रोटियां ईट बन गयी तो आप कदापि भी इसे सच नहीं मानते | इसी कारण मुझे बहाना बनाना पड़ा था |’ अब राजा-रानी अपने राजधानी की और आगे बढे |

जब राजा की फ़ौज अपनी राजधानी के समीप पहुची तो वहा के लोगो ने समझा की दूसरे राजा ने राजधानी पर आक्रमण कर दिया है | वे घबरा गए | वहा के लोग नजराना लेकर राजा से मिलने गांव के बाहर आये परंतु यह क्या ? यह तो अपने राजा है | लोगो का प्रसन्ता का ठिकाना न रहा | वे श्रद्धा -भक्ति के साथ महाराज के आगे चल कर उन्हें उनके महल में ले गए |

राजा-रानी ने महल में प्रवेश किया | रानी ने तुरंत दशामाता की पूजा का प्रबंध किया | उसने उस पूजा में नगर की सब सौभाग्यवती स्त्रियों को बुलाया | भगवती के भोग के लिए सब प्रकार के पकवान बनाये गए | आटे की दस बतिया ,दस शकर की गुंजिया और दस-दस अठवाइया सुहागिनों के आँचल मैं डाली | सुहागिनों का शंगार करके दशामाता की पूजा आरम्भ हुई | कलश स्थापित करके दीपक को जलाया गया , परन्तु उसकी बती जली नहीं | इस पर पंडितो ने कहा की -‘ कोई न्योता पाने वाला न्योतने को तो नहीं रह गया है ? स्मरण  किया जाये | उसके आने पर दीपक जल जायेगा |’ रानी ने सोच-विचार कर बताया की -‘ ननद न्योतने से रह गई है |’ पंडितो ने कहा की -‘ उसे फ़ौरन बुलाया जाये |’

राजा ने अपना दुरतगामी रथ भेजकर अपने मुह बोली बहिन को बुलवाया | उसके आतें ही कलश का माणिक दीपक प्रज्वलित हो गया | बड़ी धूमधाम से पूजा की गई | अंत मैं सुहागिनों को भोजन कराकर  विदा किया गया | उसी समय राजा ने राज्य मैं आज्ञा जारी की -‘ मेरी प्रजा के लोग दशामाता का व्रत किया करे |’

भगवती माता ने जिस प्रकार राजा नल के दिन फेरे ,उसी प्रकार सब के दिन फेरे |

 

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