दशामाता व्रत कथा 1

एक राजा था | उसकी दो रानिया थी | बड़ी रानी के संतान नहीं थी | छोटी रानी के पुत्र था | राजा छोटी रानी और राजकुमार को बहुत प्यार करता था | बड़ी रानी छोटी रानी से ईर्ष्या करने लगी |

बड़ी रानी राजकुमार के प्राण हर लेना चाहती थी  | एक दिन राजकुमार खेलता-खेलता बड़ी रानी के चोक में चला गया | बड़ी रानी ने राजकुमार के गले मई एक कला साँप डाल दिया | छोटी रानी दशा माता  का व्रत करती थी राजकुमार दशा माता का ही दिया हुआ था | दशामाता की कृपा से राजकुमार के गले में साँप बिना नुकसान पहुचाये चला गया |

दूसरे दिन बड़ी रानी ने लड्डूओ में जहर मिला कर राजकुमार को खाने के लिए दिए | राजकुमार जैसे ही लड्डू खाने लगा तो दशामाता एक दासी का रूप धारण कर आयी और राजकुमार के हाथ से लड्डू छीन लिए |

बड़ी रानी का यह वार भी खाली गया | रानी को बड़ी चिंता हुई की किसी भी तरह से राजकुमार को मारना हे | तीसरे दिन जब राजकुमार फिर बड़ी रानी के आँगन में खेलने गया तो रानी ने उसे पकड़ कर गहरे कुवे     में धकेल दिया | चूंकि कुवा बड़ी रानी के आँगन में बना था इसलिए किसी को भी पता नहीं चला की राजकुमार कहा गया लेकिन जैसे ही बड़ी रानी ने राजकुमार को कुवे में धकेला तो दशामाता ने उसे बीच में ही रोक लिया |

इधर दोपहर हो जाने पर राजकुमार के न लौटने पर राजा व् छोटी रानी को चिंता सताने लगी | दशामाता को भी इस बात की चिंता हुई राजुकमार को उसके माता-पिता के पास किस प्रकार पहुचाया जाये ? राजकुमार को तलाश करने वाले कर्मचारी निराश होकर बैठ गए | राजा व छोटी रानी पुत्र शोक में रोने लगे | तब दशामाता ने भिखारी का रूप धारण किया और राजकुमार को गले से लगाए राजद्वार पर पहुची |

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वह राजकुमार को एक वस्त्र में छिपाये हुए भिक्षया मांगने लगी | सिपाहियों ने उसे दुत्कार कर कहा – ‘ तुझे भिक्ष्या के पड़ी हे और यह राजकुमार खो गया हे | सारे लोग दुःख और चिंता से व्याकुल हो रहे हे |’ इस पर दशामाता बोली – ‘ भाइयो ! पुण्य का प्रभाव बड़ा ही विचित्र होता हे | यदि मुझे भिक्षया मिल जाये तो संभव हे की खोया हुआ राजकुमार तुम लोगो को मिल जाये |’

यह कहकर वह देहरी पर पैर रखने लगी | सिपाहियों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका | उसी समय  दशामाता ने बालक का पैर वस्त्र से बहार कर दिया |सिपाहियों ने समझा की कुँवर उसके हाथो में है इसलिए उसे अंदर जाने दिया |

दशामाता कुँवर को लिए हुए भीतर चली गयी | उसने राजकुमार को चोक में छोड़ दिया और वापस चली गयी , परन्तु रानी ने दशामाता रूपी भिखारिन को देख लिया था | उसने कहा की-‘ खड़ी रहो और कोन हो तुम ? तुमने तीन दिन मेरे बेटे को छिपाकर रखा था | तुमने ऐसा क्यों किया ? तुम्हे मेरे इस प्रश्न का उत्तर देना होगा |’

दशामाता उसी समय ठहर गयी | उन्होंने बताया की -‘ में तुम्हारे पुत्र की चोरी करने वाली नहीं हु | में तो तुम्हारी आरध्या देवी दशामाता हु | में तुम्हे सचेत करने आयी हु की बड़ी रानी तुम से ईर्ष्या रखती हे | वह तुम्हारे पुत्र के प्राण हर लेना चाहती है | एक बार उसने तुम्हारे पुत्र के गले में कला साँप डाला था | जिसे मैंने भगाया |दूसरे बार उसने इसे विष के लड्डू खाने को दिए थे | जिन्हें मैंने उसके हाथो से छीन लिए थे | इस बार उसने तुम्हारे उसने राजकुमार को अपने आँगन के कुवे में धकेल दिया था और मैंने इस बीच में ही रोक कर रक्ष्या की | इस समय में भिखारिन के वेश में तुम्हे सचेत करने आयी हु |’ यह सुनकर छोटी रानी दशामाता के पैरो में गिरकर शमा मांगने लगी |

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छोटी रानी विनती भाव से बोली – ‘ जैसी कृपा आपने मुझ पर दर्शन देकर की है | में चाहती हु की आप सदैव इस महल में निवास करे  | मुझसे जो सेवा पूजा होगी में करुँगी |’

इस पर दशामाता बोली की – ‘ में किसी घर में नहीं रहती | जो श्रद्धापूर्वक  मेरा ध्यान ,स्मरण करता हे में उसी के ह्रदय में निवास करती हु | मेने तुम्हे साक्ष्यात दर्शन दिए हे | इसलिए तुम सुहागिनों को बुला कर उन्हें यथाविधि आदर -सत्कार के साथ भोजन कराओ और नगर में ढिंडोरा पिटवा दो की सभी लोग मेरा डोरा ले और व्रत करे |’

इतना कहकर दशामाता अंतर्ध्यान हो गयी | रानी ने अपने राज्य की सौभाग्यवती स्त्रियो को निमंत्रण देकर बुलाया और उबटन से लेकर शिरोभूषण शंगार कर उनकी यथा विधि सेवा कर भोजन करवाया और दक्षिणा में गहने आदि देकर विदा किया | रानी ने अपने राज्य में ढिंडोरा पिटवा दिया की अब से सब लोग दशामाता का डोरा लिया करे |

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